कुंडलियां दिनकर का पारा चढ़ा, गर्मी हुई अजेय । जीवन की रक्षा करें, पी कर शीतल पेय ।। पी कर शीतल पेय, ध्येय गर्मी से बचना । नींबू, सत्तू, प्याज, आम का पन्ना चखना ।। 'अनहद' बुरा प्रभाव, न पड़ जाए जीवन पर । आतप का अति जोर, जलाते सबको दिनकर ।। अनुपम पाण्डेय 'अनहद'
उपमा अलंकार काव्य में जब किसी व्यक्ति या वस्तु के रूप, गुण या धर्म के आधार पर किसी अन्य प्रसिद्ध व्यक्ति या वस्तु से समानता (तुलना) की जाती है, तो वहां उपमा अलंकार होता है । इसमें "सा", "से", "सी", "सम", "समान", "सरिस", "सदृश" जैसे वाचक शब्दों का प्रयोग होता है। उपमा अलंकार के चार प्रमुख अंग होते हैं: उपमेय: जिसकी तुलना की जाए (जैसे: 'हरि पद कोमल कमल से' में 'हरि पद')। उपमान: जिससे तुलना की जाए (जैसे: 'कमल')। वाचक शब्द: समानता बताने वाले शब्द ('से', 'सा', 'सी')। साधारण धर्म: वह गुण जो दोनों में समान हो ('कोमल' से ) उदाहरण : "हरि पद कोमल कमल से" "पीपर पात सरिस मन डोला" (मन का पीतल के पत्ते की तरह डोलना) मुख्य पहचान: पद्य में 'सा', 'सी', 'से', 'समान', 'सरिस', 'सदृश्य' आदि शब्दों का दिखना। मेरी रचना : #उपमा #अलंकार झरती है बरसात सी, उसकी हँसी अभंग । पुष्प संग खुशबू सदृश, रहती मेरे ...
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